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वर्तमान पीढ़ी के संस्कार

  यह मेरा पहला ब्लॉग पोस्ट है, समय के अनुसार नई पीढ़ी अर्थात वर्तमान पीढ़ी को देखते हुए यह ब्लॉग मैं लिख रहा हूँ |

"परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है", परन्तु परिवर्तन का क्रम क्या होना चाहिए यह भी निर्भर होना चाहिए , आज-कल के अंकुरित पौधे जिनकी वृद्धि नियमानुसार ना होकर अन्य साधनों से बड़ाई जा रही है अर्थात वर्तमान के बच्चे जो उनकी उम्र से कहीं अधिक सोचने लगते है | सोच भी वह जो उनकी उम्र से कहीं अधिक जिसके कारण एक पारिवारिक भिन्नता उत्पन्न होना |

आज माता-पिता को उनके बच्चो के साथ उम्र के अनुसार व्यवहार करना चाहिए, जिसके कारण बच्चो में शिष्टाचार और संस्कार उत्पन्न हो | बच्चो को समझाना ,डांटना-फटकारना और यदि बात उनकी अच्छी तालीम की हो या उनके गलत व्यवहार की हो तो सिमित मारना भी उचित है क्योंकि आचार्य चाणक्य ने भी कहा है -"पुत्र से पांच वर्ष तक प्यार करना चाहिए। उसके बाद दस वर्ष तक अर्थात पंद्रह वर्ष की आयु तक उसे दंड आदि देते हुए अच्छे कार्य की और लगाना चाहिए। सोलहवां साल आने पर मित्र जैसा व्यवहार करना चाहिए। संसार में जो कुछ भी भला-बुरा है, उसका उसे ज्ञान कराना चाहिए |"

Fondle a son until he is five years of age, and use the stick for another ten years, but when he has attained his sixteenth year treats him as a friend.

कुछ माता-पिता अपने बच्चो को लाड प्यार इतना देते है कि एक समय एसा आता है कि वह उनकी बातो को सुनता तक नही है और कभी-कभी तो इस रूप से कहीं ज्यादा भयानक स्तिथि हो जाती है तब पुरे परिवार को शर्मिंदगी महसूस करनी पढ़ती है|

अच्छी शिक्षा,अच्छे संस्कार बच्चो को एक बेहतर इंसान बनाते है - राहुल व्यास

भारतीय परम्परा के अनुसार प्रथम गुरु माता-पिता होते है जो बच्चो को संस्कार से लेपित करते है अर्थात उन्हें सही गलत का ज्ञान कराना , बड़ो का आदर और सम्मान करना सिखाना इत्यादि | सामान्य भाषा में कहे तो नैतिक शिक्षा जो परिवाद द्वारा दी जाती है द्वितीय गुरु उनके शिक्षक होते है जो व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करते है |

आज का युग पुराने युग की तरह नही है जँहा गुरुकुल स्थापित हो गुरुकुल में नैतिक शिक्षा से लेकर हर तरह की शिक्षा से परिचित कराया जाता था, परन्तु इस युग की चिंता हमें करनी होगी और आचार्य चाणक्य के कथनानुसार आज की पीढ़ी को सुरक्षित करना होगा |

 Rahul Vyas